Article 15 movie review

आर्टिकल 15 : जाति पर मुखर होता सिनेमा

अवनीश पाठक माओत्से तुंग कहते थे- एक चिंगारी ऊंची घास के विशाल मैदानों को जला सकती है.
Kabir Singh Movie

कबीर सिंह को गुस्सा क्यों आता है?

दिनेश श्रीनेत कबीर सिंह के गुस्से में दिक्कत नहीं है। दिक्कत कबीर सिंह के प्रेम में है।

Waiting : तीन स्त्रियों का सिनेमाई जादू

‘वेटिंग’ तीन स्त्रियों का सिनेमाई जादू है। अनु मेनन का सधा हुआ, सहज निर्देशन... जिसके कारण फिल्म धीरे-धीरे आपके भीतर उतरती है। कल्कि का...

मसानः प्रेम और मृत्यु के बीच एक कविता

‘‘मसान’’ विशुद्ध सिनेमाई भाषा में रची गई कविता है। एक आधुनिक मिजाज़ वाली कविता जो अपने होने में ही अर्थ को आहिस्ता-आहिस्ता खोलती है।...

खुद को जानने की छटपटाहट, मार्गरीटा विद अ स्ट्रा

शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम नायकों पर हिन्दी में कई फिल्में बनीं हैं। अक्सर ये फिल्में अक्षम नायकों की सामाजिक रूप से स्वीकारोक्ति...

हँसाने के साथ नश्तर सा चुभो जाती है ‘आंखों देखी’

फिल्‍म के एक सीन से ही शुरू करते हैं। बाबू जी (संजय मिश्रा) अपनी बेटी की शादी का कॉर्ड छपवाने के लिए जाते हैं।...

ग्राफिक नॉवेलः नए ज़माने की नई किताबें

नोएडा में गेमिंग स्टूडियो चलाने वाले फैजल ने खुद को टेंशन फ्री रखने के लिए एक कैरेक्टर रचा गुड्डू- जो उनके अपने बचपन की तस्वीर थी। फैजल कार्टून बनाते और फेसबुक पर दोस्तों के...

एक नायक के साथ 75 साल

यह महज एक संयोग रहा होगा कि जिस महीने सुपरमैन को 75 साल पूरे हुए उसी दौरान एक अमेरिकी बिल्डिंग कान्ट्रैक्टर डेविड को मिनेसोटा में एक घर की दीवार के पीछे बरसों से अंधेरे...

बदलती दुनिया में महानायक

I'm not questioning your powers of observation; I'm merely remarking upon the paradox of asking a masked man who he is. फिल्म ‘वी फॉर वेंडेटा’ से

बंबई रात की बाहों में

राजकपूर के लिए सदाबहार हिट फिल्में देने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने खुद के निर्देशन में भी बहुत सी फिल्में बनाई हैं और आम तौर पर उनकी फिल्में तत्कालीन आलोचकों द्वारा खारिज कर दी...

अनजान टापू पर नफरत और प्रेम

किताबों और फिल्मों का गहरा रिश्ता है। गौर करें तो भारतीय समांतर सिनेमा या जिसे हम कला सिनेमा कहते हैं उसकी बुनियाद में ही आधुनिक हिन्दी साहित्य है। इस पर मैं कभी अलग से...

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LATEST REVIEWS

डॉयलॉग, डॉयलॉग और डॉयलॉग..

"माँ, मै फर्स्ट क्लास फर्स्ट पास हो गया हूँ" "माँ तुम कितनी अच्छी हो" "भैया!" "आज पिंकी का जन्म-दिन है""मैने इस ज़मीन को अपने खून से सींचा...

घटिया सेक्स कॉमेडी जैसी है अक्षत वर्मा की शॉर्ट फिल्म ‘मम्माज़ ब्वायज़’

अक्षत वर्मा की शॉर्ट फिल्म मम्माज़ ब्वायज़ को देखकर यह समझ में आ जाता है कि अभी भारत में शॉर्ट फिल्मों को गंभीरता से...

तू न आए तो क्या भूल जाए तो क्या, प्यार करके...

इस गाने पर बात करने चलें, उससे पहले तो यही अचरज जतला दें कि आरके बैनर की फ़िल्म और रफ़ी साहब का गाना! नहीं साहब,...

क्या कृष्ण हैं भारतीय नायक?

जहां हर बालक इक मोहन है, और राधा इक-इक बाला... सिकन्दर-ए-आज़म (1965) में राजेन्द्र कृष्ण का लिखा गीत भारतीय नायक की आर्किटाइपल छवि क्या है? पश्चिम में यह ग्रीक मिथकों और बाइबिल की महागाथा से ओतप्रोत...

ए स्टूपिड कॉमन मैन…

एक नजर इंडिया के आम आदमी की आइकोनिक इमेज वाली पांच फिल्मों पर आक्रोश (1980) आम आदमी का गुस्सा एक कभी न खत्म होने वाली चुप्पी बन सकता है. गोविंद निहलानी की पहली फिल्म आक्रोश में...

प्रलय की कहानियां

सिनेमा में तबाही की अवधारणा बाकायदा फिल्म मेकिंग की एक धारा के रूप में डेवलप हो चुकी है, जिनमें दुनिया के अंत या बुरे भविष्य की आशंकाओं के आसपास कहानी बुनी जाती है. चाहे भारत...

पूरब और पश्चिम

हाल में क्रुक देखते हुए यह ख्याल आया कि हमारी फिल्मों में विदेशी चरित्रों को पेश करने का तरीका कितना सतही है. क्रुक आस्ट्रेलिया में नस्लवाद की समस्या की तह तक जाने का दावा...

गांधी को समझना हो तो पॉपुलर कल्चर की तरफ जाएं

आज के संदर्भ में अगर गांधी को समझना हो तो पॉपुलर कल्चर की तरफ जाएं. चाहे वो सिनेमा हो, म्यूजिक हो या महज फैशन. बात सुनने में अटपटी लग सकती है- मगर जीवन के...
तेरे बिना ज़िंदगी से कोई, शिकवा, तो नहीं, तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन, ज़िंदगी, तो नहीं गुलज़ार (फिल्म 'आंधी' से) सत्तर के दशक की कुछ फिल्में एक अलग और सुहानी सी दुनिया रचती हैं। ये सत्तर के दशक का मध्यम वर्ग था। अपनी लाचारियों, परेशानियों और उम्मीदों में डूबता-उतराता। कभी हम...
जो अपने लिए सोचीं थी कभी वो सारी दुआएं देता हूँ...  साहिर (फिल्म 'कभी-कभी 'से) इस बार अनजाने में ही हाथ लग गए एक नौजवान के कुछ नोट्स शेयर कर रहा हूं. नाम और लोकेशन का पता नहीं, गौर से पढ़कर देखें शायद वह आपके पड़ोस में ही कहीं हो... कई...
देखते-देखते हिन्दी फिल्मों के सीक्वेल बनने लगे. सबसे पहले सीक्वेल के बारे में पता लगा स्टारवार्स सिरीज से. किशोरावस्था का ज्यादा हिस्सा सीक्वेल देखते ही गुजरा. एंपायर स्ट्राइक्स बैक पहले देखी फिर रिटर्न आफ जेडाइ- मगर स्टारवार्स आज तक न देख सका. कुछ और सीक्वेल देखे- कई बार खराब,...
हाजी मस्तान (1926-1994) साठ और सत्तर के दशक में मुंबई में एक स्मगलर और गैंगस्टर बनकर उभरे हाजी मस्तान ने भी सिनेमा इंडस्ट्री को इंस्पायर किया है. हाजी मस्तान के जीवन पर पहली फिल्म बनी दीवार और सुपरहिट हुई. अमिताभ के कॅरियर के लिए यह मील का पत्थर साबित हुई....

आने वाली पीढ़ी जब इन्हें देखेगी तो बोलेगी- ये छिछोरे लोग...

भारतीय सिनेमा में अपने किस्म के अनूठे फिल्मकार कमल स्वरूप ने लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस जाकर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई- ‘बैटल ऑफ बनारस’।...

मैं इस दुनिया की कहानी कहता हूं: राजकुमार गुप्ता

उनकी फिल्म 'आमिर' ने पहली बार मेरा ध्यान खींचा था. अपने अलग तरह के प्रोमो के कारण. बाद में मैंने यह फिल्म देखी. जिस...