कई ख्वाहिशें पैदा करने वाली फिल्म है ‘हाइवे’

1
982

हाइवे फिल्म को आप कई छोरों से पकड़ सकते हैं। तारीफ करने के इरादे से भी और आलोचना की मंशा से भी। 21 फरवरी की दोपहर तक इस फिल्म को इसलिए खारिज किया गया कि यह फिल्म मनोरंजन नहीं करती। फिर आवाजें उठीं कि मनोरंजन तो करती है बस यह इंटलैक्चुअल होकर मनोरंजन करती है। भला इंटलैक्चुअल होकर भी मनोरंजन किया जाता है। कई समीक्षकों ने तर्क रखे। इन्हें खूब लाइक मिले।

फिर नई तरह की बहसें ये हैँ कि यह फिल्म प्रैक्टिकल नहीं है। प्रैक्टिकल न होने को फिल्म के किरदारों के चमत्कारिक बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रैक्टिकलटी की बात करने वाले यह वही दर्शक और समीक्षक है जो धूम 3 को इस शताब्दी की सबसे बड़ी फिल्‍म बताते और बनाते हैं।

हाइवे फिल्म के क्रॉफ्ट से आप असहमत हो सकते हैं लेकिन इसे खारिज नहीं कर सकते। आप खारिज नहीं कर सकते इस आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा जैसी बेमेल जोड़ी के चुंबकत्व को। आप खारिज नहीं कर सकते उन पहाडों और नदियों को जो अभी तक फिल्‍मों के लिए सिर्फ लोकेशन थे इस फिल्म में वह एक किरदार थे। आप खारिज नहीं कर सकते उस फिलॉसफी को जहां शुक्‍ला अंकल पर गंभीर और अभी तक नजरंदाज कर दिए विमर्श को।

इंटरवल के बाद जब हाइवे अपने असल इरादों की तरफ चल पड़ती है तो दबंग जैसी फैसलापरक फिल्‍मों के आदी हो चुके दर्शक बोर होने शुरु हो जाते हैं। उन्हें नहीं पता कि रोने वाले दृश्यों पर वह हंस क्यों रहे हैं। सुनने वाले दृश्यों पर वह बात क्यों कर रहे हैं। इसके पीछे की वजह यही थी कि यह एक निर्देशक की सोच थी। इस बार वह अपने कुछ दर्शकों के लिए फिल्म बनाना चाहता था।

इस फिल्म को देखते हुए मुझे कुछ पुराने कवि सम्मेलन और मुशायरे याद आए। रात के करीब 10 बजे जब मुशायरे या क‌वि सम्मेलन शुरू होते हैं तो दर्शक पंडाल में मानो टूटे पड़ते हैं। फिर घड़ी 12 बजाती है, फिर 1 और फिर 3। तीन बजे जो श्रोता बच गए होते हैं वह किसी भी कवि के लिए सच्चे श्रोता होते हैं। हाइवे को वही उसी मानसिकता वाले दर्शक पंसद कर रहे हैं जिन्होंने असली कविता या शेर के इंतजार में अपनी रात खराब की है।

शायद कुछ लोगों को ऐसा सिनेमा चाहिए जो ‌फिल्म के खत्म होने के बाद उनके मन में बना रहे। यह कुछ मुट्ठीभर दर्शकों के लिए बनाई गई फिल्‍म है। लेकिन चूंकि देश बहुसंख्यकों से चलता है तो यकीन मानिए इम्तियाज शायद यह गलती दोबारा न करें।

फिल्म की कहानी, शिल्प, संगीत, लोकेशन और सिनेमेटोग्राफी पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन कुछ और बाते भी हाइवे के लिए लिखी जानी जा‌निए। जैसी हाइवे कुछ ख्वाहिशें पैदा करती हैं। यह ख्वाहिशें बस की छत पर बैठकर सफर करने की है। यह ख्वाहिशें सड़क पर गिरकर उठने की है। यह ख्वाहिशें जमीन पर उकडू बैठने की है। यह ख्वाहिशें लीक से हटकर कुछ करने की है।