‘क्वीन’ की कंगना उर्फ वो तितली जो बोली, ‘हट बदमाश!’

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सबसे पहले तो न जी, जय माता दी! “जय माता दी” इसलिए कि क्वीन कहती है  🙂  वो क्या है न आज कल मैं क्वीन की फैन हुई फिर रही हूँ। मुझे तो ये कहते हुए बिलकुल भी शरम नहीं आ रही कि क्वीन हम गर्ल्स के लिए कॉम्प्लान ही है। वो जैसे टीवी में कहते हैं कि कॉम्प्लान पीने से बच्चों में ताकत आती है। यकीन मानिये यह फ़िल्म देखकर हम गर्ल्स को भी कैल्सियम और विटामिन भरपूर मात्रा में मिलती है। फ़िल्म हमें अंदरूनी ताकत देती है। आजादी और फीयरलेसनेस इस फ़िल्म के कैल्सियम-विटामिन हैं। ‘आप देखोगे न तो धीरे-धीरे खुद ही समझ जाओगे’।

मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि क्वीन जैसी फ़िल्म भी बन सकती है कि लड़कियों की जिंदगी की सबसे अहम मुद्दो पर बात करती हुई फिल्म कहीं भाषणबाजी नहीं करती। अच्छा हुआ जो मैंने क्वीन फ़िल्म देख ली। वरना आज तक सिर्फ कल्पना में ही माँ का सुनाया वह गीत गुनगुनाती रहती- “तितली उड़ी…  बस में चढ़ी। सीट न मिली तो रोने लगी। ड्राइवर बोला- आजा मेरे पास। तितली बोली- हट बदमाश!” ये क्वीन की कहानी उस तितली और ड्राइवर वाली ही तो है। रानी तितली है। और उसका मंगेतर विजय वह ड्राईवर ही तो है, जिसे तितली को साइलेंट बैठे देखकर “तू मेरी टाइप की नहीं” सांग याद आता है। लेकिन वही तितली जब ढिंचैक बन कर पंख फैलाती है और उड़ना सीख जाती है तो गाने का ट्रैक बदलकर “आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा” हो जाता है।

क्वीन न बनती तो हम कैसे समझ पाते कि दरअसल, हमें अपने लिए लाइफ को इतना ख़राब करने वाला विजय नहीं बल्कि “मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी” गाने वाली विजयलक्ष्मी उर्फ़ वीजे का साथ चाहिए। या फिर यूं कहें कि हर लड़की की जिंदगी में एक विजय जरुर हो, जो उससे अकेले हनीमून पर जाने के लिए प्रेरित करे। किसी बिन पैंदी के लोटे से ब्याह रचाने से तो अच्छा है कि अकेले हनीमून पे चले जाये। अकेले ही पेरिस पहुंचे और अकेले ही एफिल टावर देखे। हाँ! अकेले भी हनीमून पे जाया जा सकता है। हनीमून का नया डेफिनेशन सीखना है तो क्वीन से बात करो। हनीमून का मतलब केवल फर्स्ट नाईट ही नहीं होता, वह तो यूरोप ट्रिप भी हो सकता। सच, लड़कियों के लिए ये फ़िल्म ‘हैप्पी इंडेपेंडेंस डे’ टाइप फ़िल्म है।

मुझे तो विकास बहल और कंगना से पर्सनली मिलकर उनसे शेकहैण्ड करके थैंक्स बोलने का मन हो रहा है। क्वीन डायरेक्ट करके उन्होंने ‘रांची टू राजौरी’ में रहने वाली लड़कियों के डर और झिझक की वर्जिनिटी का व्रत तोड़ने में मदद की और उन्हें आजादी दिलाई। अगर क्वीन नहीं बनती तो “सजना है मुझे (सिर्फ) सजना के लिए” ही वाले कांसेप्ट का ‘द एंड’ कैसे होता। कैसे गर्ल्स समझ पातीं कि ब्यूटीफुल लगने के लिए किसी उल्लू के पट्ठे के कानूनची स्टाम्प की जरूरत नहीं।

क्वीन न बनी होती तो सालों से चली परम्परा पर ब्रेक कैसे लगता कि दादियां केवल ताने कसने और कोसने के लिए नहीं होती, बल्कि फुलस्टॉप लगाने से रोकने वाली भी होती हैं। शादी के सिवा भी जरुरी कई काम है का पाठ भी पढ़ा सकती हैं, कि पंजाबी फॅमिली में भी रानी के माता पिता की तरह कई माता पिता हैं जो बेटी के आंसू पोछने के लिए रुमाल आगे नहीं करते और न ही लाउड टाइप रोना धोना करते बल्कि बेटी को आजादी और उसका साथ देते हैं। क्वीन न बनती तो लड़कियां कैसे समझतीं कि लाइफ को गुप्ता अंकल की तरह कैंसरग्रस्त बनाने से अच्छा है खुली हवा में सांस लिया जाये। क्वीन नही बनती तो हम कैसे समझ पाते कि खुद को खुला मिजाज दिखाने के लिए शराब पीना या छोटे कपड़े पहनना जरुरी नहीं है।

और हाँ अंत में क्वीन न बनी होती तो हम कैसे समझ पाते कि इंडियंस “किस” चीजों में बेस्ट हैं। कि फ्रेंच टोस्ट सिर्फ इंडियन ही बना सकते हैं। इंडियन के लिए ओलेक्जेंडर हो या एलेक्सेंडर- इंडियंस के लिए वह सिकंदर ही हैं. पेरिस में होता होगा एफिल टावर- इण्डिया में तो आईफिल टावर ही होता है। कि लंदन के ठुमके लंदन में नहीं इण्डिया के राजौरी में ही लग सकते। कि गोलगप्पा इंडिया का ‘रास्ट्रीय’ फ़ास्ट फ़ूड है और ‘रास्ट्रीय’ हथियार भी, जिससे किसी भी फ्रेंच का दिल और पैसे दोनों हथियाए जा सकते हैं।