तन्हा ‘गीक’ लड़की और ‘गुड फॉर नथिंग’ लड़के का किस्सा-ए-इश्क़

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जिन्हें ‘मिसफिट’ क़रार देता है आपका समाज; वह उदास, तन्हा ‘गीक’ लड़कियां और असुरक्षित, ‘गुड फॉर नथिंग’ लड़के भी पड़ते हैं इश्क़ में – और क्या ख़ूब पड़ते हैं!

अपनी तमाम मासूमियत और निष्कपटता के बावजूद समाज के बंधे-बंधाए ढांचे में ‘फिट’ न हो पाने की घुटन और बेचारगी भरी बेबसी, और अपने इस ‘अवगुण’ के चलते अपने ही कहे जाने वाले लोगों से मिलती जिल्लत, हिक़ारत, पहाड़ सी उम्मीदों के दबाव और उन्हें फिर से निराश कर देने के डर को हममें से अमूमन हर इंसान नहीं जीता, लेकिन हमारे-आपके गांवों-क़स्बों-शहरों की जिंदा सड़कों, अंधेरी गलियों, सीलन भरे बरामदों और काई जमी छतों पर टहलते, बैठे, जागते-सोते कुछ ऐसे किरदारों से हम में से हर कोई दो-चार ज़रूर होता है जिन्हें खु़द उनके ही मुहल्ले-घर-परिवार वाले अपनी परिभाषाओं के खांचों में ‘मिसफिट’ पाते हैं।

यानी नॉर्मल दिखने वाले ऐसे ‘एब्नॉर्मल’ लोग जो उनके तय किए और ढोए जाते मानकों में अपनी जगह तलाश नहीं कर पाते! अलग-अलग परिवेशों से आए और काफी अलहदा शख्सियतों के मालिक लेकिन अपनी-अपनी दुनिया में कुछ इसी तरह के ‘मिसफिट’ गिने जाने वाले दो इंसान – एक लड़का और लड़की जब मिलते हैं तो क्या होता है, इस पर एक बंधे हुए तयशुदा बॉलीवुड फॉर्मूले की हदों में रह कर ही सही, फिर भी उनके बिल्कुल क़रीब जाकर, लगभग हमसाया होकर एक गीली सी नज़र डालती है ‘हँसी तो फँसी’!

ऐसी कोई ‘अलग’ सी लड़की देखी है आपने अपने आस-पास जिसके लिए एक ‘हाई डेंसिटी पॉलीमर’ की छोटी सी बॉल का आविष्कार करने में खर्च किए गए अपनी उम्र के सात साल, बेतहाशा रक़म और अपने बाप को छोड़कर बाकी पूरे परिवार का यक़ीन – जीवन के उन मायनों से बहुत अलग हैं जिनसे उसके आस-पास की दुनिया इत्तेफाक़ रखती है और उससे भी ऐसा ही करने की उम्मीद करती है? या फिर एक सात साला बेहद तेज़ दिमाग़ लड़की जो पूरे मुहल्ले को इस लिए आफ़त में डाल देती है क्योंकि उसे अपने कमरे की कुंडी को बाहर खड़े-खड़े एक पतली सी रस्सी की मदद से अंदर से बंद करने की युक्ति खोजने में वो मज़ा आता है जिससे बाक़ी दुनिया महरूम रह कर ही पूरी उम्र बिता देती है!

फैशनेबल कपड़ों की जगह ढीली-ढाली सी टी-शर्ट के साथ अपने पायजामे की जेबों में हाथ डाल कर पीठ पर बैग टांगे, चश्मा लगाए बेफिक्री से टहलती और आईआईटी से कैमिकल इंजीनियरिंग पास कर चुकी इस ‘गीक’ लड़की की प्राथमिकताओं को कोई समझे भी तो कैसे, जिसे अपनी बहन की शादी की रात घर से पैसे चुरा कर भाग जाना सिर्फ इसलिए सही लगता है कि इन पैसों की मदद से वह एक ऐसा शोध प्रोजेक्ट पूरा कर सकती है जो पूरा होने पर पूरी दुनिया की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए एक नई रौशन खिड़की खोलने की कुव्वत रखता है!

यक़ीनन, इस किस्म की ‘गीक’ लड़की के मन में झांक पाना तो सिर्फ एक ऐसे ‘गुड फॉर नथिंग’ लड़के के ही बस की बात है जिसे ‘सेल्फ रिस्पेक्ट’ और ‘ईगो’ में कोई फर्क मालूम न होता हो, और जो एक बच्चे जैसे भोलेपन के साथ अपने होने वाले ससुर से ठीक सगाई वाले दिन ही एक बड़ी रक़म उधार मांगने में वाक़ई कोई शर्म महसूस नहीं करे – और वह भी इसलिए ताकि कई धंधों में नाकामयाबी की चोट खाने के बाद वह अपने नए-नवेले धंधे में कुछ रक़म डाल कर क़ामयाब हो सके और अपनी शायद ही कभी संतुष्ट होने वाली प्रेमिका/मंगेतर को खुश कर सके!

आईएएस और आईपीएस अफसरान के ख़ानदान की शान में लगभग धब्बे की तरह माने जाने वाला एक ऐसा लड़का, जो जानता है कि अपने परिवार का ‘अलग’ हिस्सा होना कैसा होता है, कि अपनी अंतरात्मा की निश्छल सच्चाइयों के लिए पूरी तरह ईमानदार होना कितना मुश्किल होता है ख़ासकर जब उसके लिए आपको अपने आस-पास की दुनिया की उम्मीदों और ख्‍़वाहिशों को लगभग क़त्ल करना पड़े, सब कुछ बाक़ायदा जानते-समझते!

और इन्हीं अजीब से हालात में जब यह लड़का और लड़की मिलते हैं, बल्कि फिर से मिलते हैं – तब आप रूबरू होते हैं उस एहसास से जो एक तन्हाई के दूसरी तन्हाई से मिलने पर पैदा होता है! ठीक यही वह तन्हाई होती है जिससे आपके समाज के द्वारा ‘मिसफिट’ क़रार दी गई लगभग सारी ख़ामोश, जिद्दी, उपेक्षित लेकिन फिर भी बेहद निर्दोष और निष्कपट रूहें ताजिंदगी गुज़रती हैं, बशर्ते इस दौरान वे अपनी सी ही किसी ‘मिसफिट’ शै से वह न टकरा जाएं धोखे से! इस नाकारा लड़के के तौर पर सिद्धार्थ मल्होत्रा ज़ाहिर करते हैं कि ज़बान के बजाय ख़ामोश आंखों से सब कुछ कह जाने की परंपरा के अदाकारों की फेहरिस्त में वे अपना नाम दर्ज करवाने का इरादा रखते हैं!

वहीं इस अजीब-ओ-ग़रीब सी लड़की के रूप में परिणीति चोपड़ा एक बार फिर से साबित करती हैं कि उनका वज़न उनकी चचेरी बहन प्रियंका से तौले जाने की कवायद कितनी बचकानी और बेमानी है, ख़ास कर तब और भी ज्‍़यादा जब अपने किरदारों के चयन और बेलौस-बेपरवाह अदाकारी के ज़रिए वे पहले ही इस बात के संकेत दे चुकी हैं कि जिस आसमान में उड़ान भरने की वे ख्‍़वाहिश रखती हैं, वह प्रियंका की आंख चौंधियाती स्टार पॉवर की आभा में लिपटे रहस्यमयी लोक के जादू की क़ैद से आज़ाद ही रहना चाहता है!

लेकिन इन दोनों पात्रों के साथ-साथ एक और बारीक़, नर्म लेकिन बेहद मजबूत धागा है जो इन्हें आपस में जोड़ता है – और वह है उस लड़की का उससे बेपनाह मुहब्बत करने वाला, और साथ ही साथ उसके ‘विलक्षण’ होने को पूरी इज्‍़ज़त और संरक्षण देता आया उसका पिता, जिसे अपनी बेटी को यह ‘नाजायज़ छूट’ दिए जाने का आरोप बिना किसी ग्लानि और शर्त के सिर्फ स्वीकार ही नहीं है बल्कि उसे गर्व भी है अपनी बेटी पर! मनोज जोशी पर्दे पर ऐसा ग़ज़ब भी ढा सकते हैं, आज से पहले शायद ही किसी ने सोचा हो, भले ही एक लंबे वक्‍़त से हम बरास्ता गुजराती-हिंदी थिएटर/टीवी/सिनेमा उनकी अदाकारी के रंग देखते रहे हों!

यह वह फिल्म है जिसे देखते वक्‍़त करन जौहर के रचे कल्पनातीत, रंग-बिरंगे उत्सवधर्मी परिवेश की दीवारों को खुरचती अनुराग कश्यप के उदास यथार्थ की नज़र दबे स्वर में यह ताज़गी भरा ऐलान करती है कि इस प्रकार की विलक्षण साझेदारियां बॉलीवुड की तस्वीर को कुछ नए आकार और रंग देने की शुरुआत कर चुकी हैं, जो अनुराग-रनबीर की आने वाली ‘बॉम्बे वेल्वेट’ को लेकर उम्मीदें और उत्सुकता दोनों जगाता है!

कहीं न कहीं प्रेम त्रिकोण के यश चोपड़ा द्वारा गढ़े गए मुहावरों को ही ‘हँसी तो फँसी’ एक नई ज़बान में पेश करती है, लेकिन यह ‘नई ज़बान’ वाक़ई इस तरह से ‘नई’ है कि हमारे इर्द-गिर्द रवां होते उन ख़ामोश अफ़सानों की आवाज़ को भी पूरी संवेदनशीलता से सुनती है, जिन्हें सुनने की फिक्र या सलाहियत अमूमन उनके सबसे क़रीब दिखने वाली दुनिया में भी नहीं होती!