अतीत के चलचित्र

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1928

कभी निर्मल वर्मा ने यह उपन्यास के सिलसिले में कहा था कि एक अच्छे उपन्यास की पहचान यह होती है कि उन शब्दों में बसा जीवन हमारे खुद के जीवन में उतर आता है. क्या यह सिनेमा का भी सच नहीं है? सिनेमा उतना ही मेरी यादों में बसा है, जितनी कि मेरे वास्तविक जीवन की छवियां… प्रोजेक्टर के पीछे से झिलमिलाती रंगीन रोशनियां आती-जाती सांसों में बस चुकी हैं.

बचपन में एक फिल्म देखी थी, संजीव कुमार की उलझन… नायिका से अनजाने में शादी की रात एक कत्ल हो जाता है, शादी के बाद कातिल की तलाश का काम उसके पति को सौंप दिया जाता है. इसका एक गीत मेरे मन पर छाया रहा.. मुझको तो बस कातिल की इतनी पहचान है, भोला-भाला चेहरा है दिल बेइमान है… ऐसे तमाम गीत बचपन में मन में छाए रहे. प्रेम का रोग बड़ा बुरा…, चल सन्यासी मंदिर में…, परदेसिया… आज जब ये गीत बजते हैं तो मन में कौंध उठती हैं बरेली की गलियां, सन्यासी और जय संतोषी मां के गीतों की धुन पर घरों में नृत्य करती नन्ही बच्चियां, बनारस की बारिश से भीगी सड़क और किसी दुकान पर रेडियो पर बजता मिस्टर नटवरलाल का वह गीत. कुछ धुनों के साथ बिंब मन में कैद हो चुके हैं.

किशोरावस्था के रूखी बयार जैसे दिनों में भी हर सिनेमा किसी खास याद से जुड़ा है. एक फिल्म थी धर्म और कानून. देखा तो बहुत बुरी लगी… पर लगता है अंतिम सांसों तक याद रहेगी… शहर के बाहरी छोर पर बसे सिनेमा हाल में घटी दरों पर लगी इस फिल्म को जब देखने गया था तो इतनी बारिश हुई थी कि लगा आसमान फट पड़ा है… लौटते समय हम बुरी तरह भीग गए थे, मेरे दोस्त ने सुझाया- घर जाते ही अदरक वाली चाय पी लेना.. नहीं तो बीमार पड़ जाओगे. सिनेमा और बारिश का शायद मुझे खासा रिश्ता रहा है. बचपन में कोई भोजपुरी फिल्म देखने गया तो इतनी जबरदस्त आंधी आई थी कि हाल के भीतर छत का कोई टुकड़ा टूट कर गिर गया और अंधेरे में मैं घबराकर रोने लगा. राजा-जानी देखने गए तो इंटरवल में बार झांकने पर पता चला कि इतने काले बादल घिर आए थे कि बाहर लोगों ने अपने दुकान की बत्तियां जला ली थी और फिल्म खत्म हुई तो बाहर सड़क पर घुटनों तक पानी लगा था.

बारिश, सिनेमा और यादों की एक किश्त है… फिल्म थी नाम, उम्र होगी कोई 17 बरस, दोस्त एडवांस टिकट खरीदकर लाया था. मगर ग्यारह बजे से ही जो पानी बरसने लगा तो थमने का नाम ही नहीं लिया. हम रेलवे कालोनी में एक मकान के दरवाजे के बार इंतजार करते रहे. पहले मन बनाया था कि फिल्म छोड़ दी जाए. आखिर में तय किया कि नहीं चलते हैं. भीगते हुए गए. फिल्म शुरू हुए आधे घंटे से ऊपर हो चुका था. पानी टपकाते हुए घुसे तो आसपास बैठे लोग भी चिड़चिड़ाने लगे. मगर मजे से कमीज के सारे बन खोलकर फिल्म देखने बैठे. फिल्म देखी तो मैं स्तब्ध रह गया. कोई कामर्शियल फिल्म एक सधी हुई कहानी के साथ, गहरे अंडरकरेंट वाले डायलाग, अच्छा अभिनय और भी बहुत कुछ ऐसा जो अब तक हम व्यावसायिक सिनेमा में देखने की उम्मीद नहीं करते थे. उस दिन के बाद से मैं काफी समय तक महेश भट्ट का फैन रहा, हालांकि उस वक्त तक मैंने उनकी इससे पहले आई अर्थ और सारांश फिल्म नहीं देखी थी.

थोड़े और युवा हुए तो कयामत से कयामत तक और मैंने प्यार किया की गुनगुनाती धुनों पर जिंदगी की ट्यून सेट करने की असफल कोशिश करते रहे. परिंदा के पोस्टर देखकर हैरान हुए और जब फिल्म देखी तो उसका असर इस कदर दिमाग पर छाया रहा कि कम से कम उसे तीन-चार बार सिनेमा हाल में देखा होगा. अक्सर हम घटे दरों पर सिनेमा देखते थे. क्योंकि हमारी जेब को वही रास आता था. हालांकि पहला दिन पहला शो देखनी की दीवानगी भी कम नहीं थी. घटे दरों की फिल्में अक्सर उपेक्षित, पुराने, टूटी कुर्सियों और खराब प्रोजेक्टर पाले सिनेमा हालों में लगा करती थीं, जिनकी दीवालें पान की पीक से अक्सर बदरंग होती थीं. गेट पर एक मुश्टंडा सा आदमी खड़ा होता था और भीतर जहां-जहां लोग बैठे होते थे बस वहीं के पंखे चलाए जाते थे.

इन यादों का सिलसिला तो बहुत लंबा है.. ये तो बस अंधेरे में कौंधते कुछ स्टिल्स भर हैं.

6 COMMENTS

  1. दिनेश जी बहुत रोचक आलेख है। हमारे बचपन और बङे होने के दौरान फिल्मों का इतना जबरदस्त असर होता है कि वास्तव में फिल्म अच्छी है या बुरी यह बात बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण भी नहीं रह जाती। उलझन फिल्म मैंने दूरदर्शन पर देखी थी और इतना याद है कि उस में संजीव कुमार के साथ सुलक्षणा पंडित थी और उसका टाइटिल गीत था अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं, इसके अलावा फिल्म में क्या था, किस बारे में थी कुछ याद नहीं। बहरहाल आप के ब्लाग पर फिर आना होगा।

  2. sir kahu ya mitra,magar pata nahi kyon aapki cinemai aur baarish ka mel ..aisa lagta hai main apni kahani padh raha hu…apne sahar mein 6-9 ka show dekhne gaya tha …AGNIPATH(amitabh wali)bahar aaya to pani path ho gaya tha..ghutne tak paani fir yahi wakya khuddar(govinda wali )mein hua aur bhi kai yaadein hai
    aapki post pe ab hamesha hi aana hoga
    aapke naye post ka intezar hai…