दक्षिण का सिनेमा

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बैंगलोर के शुरुआती महीनों में वीडियो कोच वाली बस से सफर करते हुए बहुत सी दक्षिण भारतीय फिल्में देखते वक्त कटा. दक्षिण के सिनेमा ने अपनी एक खास सिनेमाई भाषा विकसित कर ली है. यहां तक कि उनका व्यावसायिक सिनेमा भी हिन्दी सिनेमा के मुकाबले ज्यादा भारतीय किस्म का सिनेमा है. वैसे दक्षिण के सिनेमा से मेरा परिचत कोई नया नहीं है. नब्बे के दशक में दूरदर्शन भारतीय भाषाओं की फिल्में दिखाया करता था. (शायद आज भी दिखाता हो…) मैंने दक्षिण की पहली फिल्म निंजरे किल्लते देखी. यह तमिल भाषा की फिल्म थी और सुबह दौड़ने के लिए जाने वाली एक शांत स्वभाव की लड़की के जीवन में आते-जाते उतार-चढ़ाव को अभिव्यक्त करती थी.

बाद में दक्षिण के जिस अहम निर्देशक के बारे में मैने जानना शुरू किया वह थे अदूर गोपालकृष्णन और जी अरविंदन. अदूर की फिल्म मुखामुखम (फेस टू फेस) की पटकथा मैंने अंग्रेजी में पढ़ी थी. उनकी इसी फिल्म के बारे में काफी कुछ पढ़ा भी. उसके बाद मत्तिलुकल (द वाल्स) में अपनी गहन संवेनशीलता के चलते अदूर एक बार फिर जबरदस्त चर्चा का विषय बने. जी अरविंदन की सिने भाषा और अमूर्तन को लेकर किए गए उनके प्रयोगों के बारे में मैने बहुत कुछ पढ़ रखा था मगर मुझे उनकी सिर्फ दो फिल्में देखने का मौका मिला. एक फिल्म सर्कस के जीवन पर थी और दूसरी एक गांव में कथकली नर्तकों के ऊपर बनाई गई थी.


इस दौरान किशोर वय में अचानक सिनेमाहालों में दक्षिण के निर्देशकों और अभिनेताओं की फिल्मों का मानों सैलाब सा आ गया था. काफी बनावटीपन और मसाला होने के बावजूद इन फिल्मों के कथ्य और राजनीतिक तेवर ने मुझे आकर्षित किया. मुझे नहीं लगता कि किस्सा कुर्सी का और आंधी को छोड़कर किसी उत्तर भारत के निर्देशक ने राजनीतिक तेवर वाली फिल्म बनाने का साहस किया होगा. जबकि मुझे अच्छी तरह से याद है कि बहुत सतही तौर पर व्यवस्था की आलोचना करने वाली फिल्म मेरी आवाज सुनो उस समय आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई थी. इस फिल्म के निर्देशक एसवी राजेंद्र सिंह की बनाई फिल्म शरारा और मेरा फैसला भी मुझे काफी पसंद आई. उनकी फिल्मों में लगातार चेजिंग जैसा माहौल और स्थितियों को खींचने की उनकी कला वास्तव में काबिले-तारीफ थी. हालांकि मुझे पता है कि अब उनकी फिल्में मैं देखुंगा तो वह ज्यादा पसंद नहीं आएंगी.

इसी दौरान व्यवस्था, कानून और राजनेताओं का माखौल उडा़ने वाली कई और दक्षिण की फिल्में आईं, लगभग सभी को मैंने बड़े चाव से देखा. इनमें अमिताभ बच्चन की इनकलाब, रजनीकांत की मेरी अदालत और अंधा कानून तथा राजेश खन्ना की आज का एमएलए रामअवतार जैसी फिल्में शामिल थीं. कहने की जरूरत नहीं कि इन फिल्मों ने जिस तेवर के साथ व्यवस्था की आलोचना की थी, उसी ने इन फिल्मों को हिट भी बनाया था. इस दौरान दूरदर्शन पर गहरी सामाजिक-राजनीतिक चेतना वाली दो फिल्मों ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया. के बालाचंदर की जरा सी जिंदगी और एक नई पहेली काफी अंडररेटेड फिल्में रहीं, मगर मेरे ख्याल से इन फिल्मों में बहुत तीखे किस्म के सामाजिक-राजनीतिक तेवर देखने को मिलता है. उसी दौर में दूरदर्शन पर आई के बालाचंदर की अकाल पर बनी एक फिल्म (नाम भूल गया है) तो उस दौर में श्याम बेनेगल और मृणाल सेन के कलात्मक सिनेमा के स्तर को छूती थी.

इस बीच मुझे आईवी शशी की एक फिल्म अनोखा रिश्ता देखने को मिली. बड़ी उम्र के व्यक्ति को चाहने वाली लड़की की यह करीब 20 साल पहले आई कहानी इस दौर की निःशब्द और चीनी कम से कहीं ज्यादा परिष्कृत लगती है. इस बीच दक्षिण की फिल्में और ज्यादा परिष्कृत होती गईं… और लगभग हतप्रभ करने वाले कौशल के साथ मणिरत्नम की फिल्में सामने आईं. यह दक्षिण भारत की फिल्मों का एक अलग दौर था, जिसमें मणिरत्नम, शंकर, और कथीर जैसे निर्देशक सामने आए. खास तौर पर मणितत्नम और शंकर ने तो पॉपुलर सिनेमा की शैली में गंभीर बात करने की एक सर्वथा नई शैली ही विकसित कर डाली… इसके बारे में मैं कभी विस्तार से लिखना चाहूंगा.

दक्षिण के सिनेमा में जो मुझे खास बात दिखती है वह ये है कि उन्होंने कहानी कहने की अपनी सर्वथा मौलिक शैली विकसित की. खास तौर पर उनके संपादन की शैली अद्भुत होती है और बहुत सी फिल्मों के दृश्यों को विश्व सिनेमा के स्तर पर रखा जा सकता है. चाहे वो सागर संगमम और एक दूजे के लिए में कमल हासन के तीव्र नृत्य के दौरान का संपादन हो या फिर महानदी में कमल हासन को भीड़ द्वारा पीटे जाने का दृश्य या स्वाति मुत्यम में महापूजा के दौरान दिमागी रुप से कमजोर कमल हासन का एक विधवा की मांग में सिंदूर भरने का दृश्य हो. संपादन में एक नृत्य के समान रिदम पैदा करना दक्षिण के सिनेमा में ही देखने को मिलता है.

दूसरी सबसे बड़ी खूबी यह है कि दक्षिण के अच्छे निर्देशकों ने प्रकृति की सुंदरता के फिल्मांकन की जितनी भी संभावनाएं हो सकती हैं उन्हें एक्सप्लोर करने का प्रयास किया है. उनकी फिल्मों मे उच्च तकनीकी दक्षता के साथ ही वहां के रहन-सहन, वहां के गांव, उनका पहनावा और परंपराओं तथा रीति-रिवाज बड़े ही सुंदर तरीके से देखने को मिलते हैं. यानी कि विश्व सिनेमा के लिए वह विशुद्ध भारतीय फिल्मों का बाजार तैयार कर सकती हैं.