महान निर्देशकों की बेवफा स्त्रियां

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पिछले दिनों फ्रांसुआ त्रूफो की फिल्म ‘वीमैन नेक्स्ट डोर’ देखते हुए यह सवाल मेरे मन में कौंधा कि तमाम महान निर्देशकों का बेवफा स्त्रियों के प्रति इतना ज्यादा रुझान देखने को क्यों मिलता है? ‘वीमेन नेक्स्ट डोर’ में पति और पूर्व प्रेमी के बीच फंसी एक स्त्री की दुविधा बयान की गई है, जिसका त्रासद अंत एक हत्या और आत्महत्या के साथ होता है। इससे पहले इंगमार बर्गमॅन की समर विद मोनिका (जिसका जिक्र पहले कर चुका हूं) भी एक युवती के मन की अतल गहराइयों की पड़ताल करती चलती है।

जिन्होंने ‘गॉन विथ द विंड’ देखी होगी, वे उसकी स्कारलेट ओ’ हारा को कैसे भूल सकते हैं। अपने प्रेमी एशली और खुद को प्यार करने वाले क्लार्क गेबल को छोड़कर वह दो बार उन लोगों से शादी करती है और विधवा हो जाती है जिन्हें वह प्यार नहीं करती। उसकी अंतिम शादी भी सफल नहीं होती और उसे दिलो-जान से चाहने वाला शख्स क्लार्क गेबल भी उसे छोड़कर चला जाता है। गौर करें तो स्कारलेट का चरित्र कुछ-कुछ बर्गमॅन की मोनिका से मेल खाता है।

वैसे देखें तो यह रुझान साहित्य में भी चला आ रहा है। लियो टालस्टाय की ‘अन्ना कैरेनिना’, फ्याबेयर की ‘मादाम बावेरी’ और चेखोव की कुछ कहानियों का जिक्र करना काफी होगा। इत्तेफाक से दोनों ही उपन्यासों का आधार लेकर फिल्में भी बनाई गई हैं। ‘अन्ना कैरेनिना’ की मुझे अब हल्की सी याद रह गई है। फिल्म का अंतिम दृश्य मुझे यादगार लगता है जब अन्ना आत्महत्या करती है। वहीं मदाम बावेरी पर केतन मेहता एक बहुस्तरीय फिल्म बनाने में सफल रहे। बाद में केतन मेहता ने जेम्स हेडली चेईज के उपन्यास ‘द सकर पंच’ का आधार लेकर बनी फिल्म ‘आर या पार’ में भी बेवफा स्त्री के फार्मुले को दोहराने का प्रयास किया मगर बात बनी नहीं। चेखोव की एक कहानी ‘तितली’ पर मैंने कई बार टीवी एपिसोड और टेलीफिल्में देखी हैं, मुझे यकीन है कि इस पर फिल्म भी बनी होगी।

वैसे श्वेत-श्याम फिल्मों के दौर में एक ‘बेवफा’ नाम से ही एक फिल्म आई थी, जिसमें नरगिस अपने पूर्व प्रेमी राजकपूर और पति अशोक कुमार के बीच भ्रमित सी नजर आती हैं। फिल्म का अंत डार्क और त्रासद है। बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘गुमराह’ भी इसी से मिलते-जुलते विषय को लेकर चलती है मगर तात्कालिक मूल्यों के मुताबिक यह एक सामाजिक संदेश के साथ खत्म होती है।कुछ-कुछ इसी विषय को छूकर गुजरती फिल्म ‘गाइड’ को कौन भूल सकता है? क्लासिक का दर्जा पा चुकी विजय आनंद की इस फिल्म में वहीदा रहमान के चरित्र की अनेक पर्तें हैं। भारत के महान निर्देशक गुरुदत्त ने भी अपनी फिल्म ‘प्यासा’ में माला सिन्हा के विवाहेत्तर रुझान को इंगित किया था। बाद के दौर में भी इस विषय को कई तरह से दुहराया गया, जिसमें ‘पारोमा’, ‘गृहप्रवेश’, ‘भूमिका’ और ‘रिहाई’ जैसी फिल्में शामिल हैं।

कुल मिलाकर तमाम महान निर्देशकों या श्रेष्ठ कही जाने वाली फिल्मों में कहीं न कहीं एक छली, मायावी, फरेब का जाल बुनने वाली या फिर मन की पर्त-दर-पर्त जटिलताओं में उलझी हुई स्त्रियों की अनिवार्य सी मौजूदगी दिखती है। कई बार तो इन मायावी स्त्रियों की पड़ताल करते हुए त्रुफो जैसे निर्देशक भी ऐसी भूल-भुलैया में जा फंसते हैं कि फिल्म खत्म होने तक उससे निकल ही नहीं पाते।यह लिस्ट बहुत लंबी होगी। यह मेरी जानकारी और याददाश्त की सीमा है कि मैं कुछ ही फिल्मों के नाम गिना सका हूं। बजाय अधिक कुछ लिखने के मैं यह सवाल एक खुली बहस के रूप में छोड़ देना चाहता हूं कि आखिर क्यों महान रचनाकारों को ये बेवफा स्त्रियां अपनी ओर आकर्षित करती हैं? मेरे लिए तो अभी यह अनसुलझा सा सवाल है… शायद आप बेहतर बता सकें…!

6 COMMENTS

  1. थोड़ा-थोड़ा फ़िल्मसमीक्षा और थोड़ा तुलनात्मकता के साथ ऐतिहासिकता को वैश्विक सिनेमा के परिदृश्य में उकेरने वाला आपका ब्लॊग पहली बार देखा, अच्छा लगा है।

    मैं हिन्दी में नेट पर विविध विषयों पर लिखने वालों की तलाश में हूँ ताकि इस भाषा में सर्वतोमुखी लेखन को प्रसरित व स्थापित किया जा सके। इसी भावना से एक समूह भी संचालित करती हूँ- हिन्दीभारत (http://groups.yahoo.com/group/HINDI-BHARAT/ )
    आप चाहें तो वहाँ स्वागत है।

  2. पुरुष के लिये स्त्री की बेवफ़ाई बहुत बड़ी दुर्घटना है और जितना फ़्रायड कहते हैं उससे कहीं ज़्यादा मारक और पुरुष के हाथ से बाहर की दुर्घटना है, इसलिये मेरा ख़याल है कि यह विषय उनके ज़ेहन में इस कदर बैठा हुआ है।

  3. आपको इतने दिनों बाद फिर से देखना सुखद है। वर्ल्ड मूवीज पर अकी कॉरिसमाकी (फिनलैंड) की फिल्में दिखाई जा रही हैं, देखिएगा। मैंने उनकी द मैच फैक्टरी गर्ल और मैन विदाउट ए पास्ट देखी, और मैं स्तब्ध हूं।

  4. दिनेश भाईसाब, आपने फिर लिखा। देख कर खूब अच्छा लगा।
    जिसे ग्रे या निगेटिव कैरेक्टर कहा जाता है, दरअसल वहीं हमारी भावनाएं उकसान में कामयाब होता है। उस चरित्र के पास हमें जिंदगी के स्याह पक्ष के बारे में बताने को बहुत कुछ होता है। वह जिंदगी में गलतियां करता है। उलझता है, भोगता है, बाहर निकलने के लिए फड़फड़ाता है। दोबारा इन झंझटों में न फंसने की कसम लेते हुए। लेकिन वह अभिशप्त है। फिर-फिर वही सब करने को….। तो ये जो कलाकार होते हैं, वे इन्हीं के पास जाते हैं। अब एक पवित्र, सुलझी, डरती हुई सी भली आत्मा को आप कितना और क्या रोचक बना देंगे। एक आम आदमी की भला उसमें क्या और कितनी रुचि हो सकती है। नियमों से बंधी रुटीन जिंदगी जीते लोग इतिहास नहीं बनाते। किसी परिवर्तन के भागी नहीं होते। जरूरी नहीं कि इसके लिए बुरा ही बना जाए। सकारात्मक होकर भी ये हो सकता है। खैर, वह अलग बहस है। दरअसल ये जो ग्रे शेड हैं न, यही हमारी फेंटेसी हैं। ये वह सब करते हैं जो हम करना या होना चाहते हैं। लेकिन ज्यादातर डर, उलझनों या संस्कारों के चलते कर नहीं पाते। तो हमारी बेचारगी हमें इनके प्रति आकर्षित करती है। ये रोचक होते हैं। इनकी कहानियां बनाई जाती हैं। फलसफे गढ़े जाते हैं। सबक लिए जाते हैं। और इसलिए ये विचार या कला का अहम हिस्सा बन जाते हैं। दोस्तोएवस्की ने इडियट में इस संबंध में सवाल भी उठाया है कि सामान्य के बजाय विशेष लाक्षणिक गुण वाले चरित्रों को ही साहित्यकार में क्यों तवज्जो देता है। हालांकि उन्होंने इसे जस्टीफाई नहीं किया। मुझे पूरा याद नहीं है।
    मनीष